Tuesday, October 14, 2008

बस यूँ ही.......

कभी कभी बस यूँ ही कुछ लिखते जाते हैं...ना वो ग़ज़ल है ना ही कविता.... ये तो बस यूँ ही ......:)

दिल की राहों पर चलते चलते
अक्सर राही खो जाते हैं।
पर ग़म के अंधियारों में ही तो
खुशियों के दीप झिलमिलाते हैं।

चुनी हो राहे कितनी ही जुदा मगर
साथ छुटा हो भले ही, प्यार टूटा न हो अगर
राहो के अनजाने मोड़ो पर
बिछडे हमसफ़र यूँ ही मिल जाते हैं।

सिले हुए से हैं ये अधर, पर आँखें सब कह जाती हैं
ढेरो ग़म ढेरो बातें उस नीर के संग बह जाती हैं
फ़िर से सपने खिलते हैं और दिल को भी ललचाते हैं
छोड़ पुराना संग बसेरा, हम आगे चलते जाते हैं॥


1 comment:

Nadineti said...

so true so touching
the best thing about all your poems is the introduction, which makes it separate from the crowd.